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एक शिकवा व्यास नदी से

 

 

 

 

 

 

 

ऐ नदी तू निरन्तर बहती ,
झेल दिन भर पाषाणों को
क्यूँ हुई इतनी पत्थर दिल सी।
देख इन मासूम चेहरों को ,
आत्मा तेरी तनिक ना हिली।

माना गलती थी मानव की ,
तो उन्ही को सजा दी होती।
क्या दोष था प्यारे बच्चों का …
क्या खेलने की सजा दी….
नादान होता है बचपन ,
यूँ ही कोई सजा दी होती।
पत्थरों से पटक पटक कर ,
जान तो ना ली होती।
ना जाता किसी आँख का नूर ,
कोई गोद ना सुनी होती।

क्या गलती थी
उन पालनहारों की।
बन छाया अपने लाल की ,
उनपर आंच ना आने दी।
जब थे वो नौनिहाल
तेरे आँचल में ,
तू इतनी बेबस बेजान क्यों थी।
आज हर दिल, हर मन है दुखी।
नम आँखों से देते श्रद्धांजली।

डॉ अर्चना गुप्ता

 

4 Comments

  • yogi saraswat commented on June 25, 2014 Reply

    माना गलती थी मानव की ,
    तो उन्ही को सजा दी होती।
    क्या दोष था प्यारे बच्चों का …
    क्या खेलने की सजा दी….
    नादान होता है बचपन ,
    यूँ ही कोई सजा दी होती।
    पत्थरों से पटक पटक कर ,
    जान तो ना ली होती।
    ना जाता किसी आँख का नूर ,
    कोई गोद ना सुनी होती।
    एकदम सटीक और दमदार शब्द डॉ . साहिबा

  • Amit Agarwal commented on June 19, 2014 Reply

    Profound! Poignant!!

    • Dr. Archana Gupta commented on June 20, 2014 Reply

      बहुत बहुत शुक्रिया अमित जी।

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