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गीत लिखूं एक ऐसा (गीत1 )

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मैं गीत लिखूँ इक ऐसा
हो सबके मन  का जैसा

ना राजा हो ना रानी
हो सब लोगो की बानी
सबकी ही गाथा जैसा
मैं गीत लिखूँ इक ऐसा

हर कोई नाचे गाये  
खुशिओं  में झूमा जाये
मुस्काये कलिका जैसा
मैं गीत लिखूँ इक ऐसा

हर ले जो सबके गम को
पी जाये जग के तम को
दीपों की माला जैसा
मैं गीत लिखूँ इक ऐसा      

 जो साजन घर ले जाये
सखिओं की याद दिलाये
बाबुल के अँगना जैसा
मैं गीत लिखूँ इक ऐसा

डॉ अर्चना गुप्ता

 

 

 

 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

4 Comments

  • Ashish kumar commented on July 31, 2014 Reply

    bahut sundar kavita… apki is kavita ki tareef me meri taraf ye panktiyan…

    ” main kavita padhna chahoon aisa.
    jo ho “geet likhun ek aisa” jaisa. ”

    wonderful…

  • alka narula commented on July 20, 2014 Reply

    bahut sunder geet !

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