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पुनर्जन्म माँ का

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बेटे को देकर जन्म
बढ़ जाता है माँ का ओहदा
सबकी दृष्टि में
पर जन्म देकर बेटी को
भीग जाती है माँ खुद
सृजन की संतुष्टि में

बेटी की हर अदा हर मुस्कान
भर देती माँ को
भावनात्मक तृप्ति में
क्युंकि बेटी में देख अपनी छवि
भीग जाती यादों की वृष्टि में

उसके हर पल में घूम  लेती
अपने ही बचपन में
जो रह गए थे कुछ मलाल
जुटी रहती उनसे
बेटी को बचाने में
जो रह गए थे अधूरे ख्वाब
उन्हें पूरा करने में

चाहे दुःख हो चाहे सुख
रहती बेचैन
बेटी से साझा करने में
सहेली सी पा लेती है माँ
वयस्क होती बेटी में

उम्र के बढ़ते दौर में
अपना दिल टटोलती है
बेटी  के दिल में

सच है बेटी जनकर ही

माँ जी पाती है
दो जन्म
एक ही जन्म में …

डॉ अर्चना गुप्ता

 

2 Comments

  • A.K.Singh commented on January 3, 2015 Reply

    ho gaya ahesas maa ka ,jo agar yeh soch paya.
    betiyaun se jagat ka yeh vraksh falta – phulta hai.

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