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बदलता वक़्त और माँ

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कल सिखाया था जिसको
उँगली पकड़ कर चलना ,
सिखाई थी दुनियादारी
और मुश्किलों से लड़ना ,
आज वही बेटा
समझाता है माँ  को ,
जब मेरे मिलनेवाले आएं
तो अन्दर ही रहना माँ।
बंद कमरे में टी वी का रिमोट
थमा देता है माँ को।

थपक २ कर सुलाया कभी
जागकर रात भर
पंखा झलती रही ,
आज जब उठ जाती है
रात में घबरा कर,
बत्ती जला कुछ कहती है
बुदबुदाकर ,
बेटा समझाता है माँ को ,
बहुत काम है मुझे
नाहक यूँ ही ना उठाया करो ,
नींद की गोली दे
सुला देता है माँ को।

कहानी सुनाना, लोरियाँ गाना ,
तोतली जुबां पर वारी २ जाना ,
कल की बात लगती माँ को।
आज वही माँ
तरसे दो बोल को ,
चाहे दो पल साथ बिताना।
बेटा समझाता है माँ को
बहुत बोलती हो ,
थोड़ा गम ख़ाना भी सीखो।
बहु को बेटी भी बनाना सीखो।

छलछला जाती हैं

माँ की अँखियाँ

कहने लगती है

बेटे को समझाकर
तेरी तो माँ थी ना जब
तू ही नहीं समझा मुझे यहॉँ ,
माँ बनू किसी और की
अब मुझमे ये हिम्मत  कहाँ।
बेटा अवाक् सा जड़ हो
देखता रह जाता है माँ  को।
डॉ अर्चना गुप्ता

 

6 Comments

  • Saru Singhal commented on June 18, 2014 Reply

    Very beautiful, touched my heart.

    • Dr. Archana Gupta commented on June 20, 2014 Reply

      बहुत बहुत शुक्रिया सरु जी।

  • Priti commented on May 26, 2014 Reply

    Very touching, brought tears to my eyes.

  • hema commented on May 16, 2014 Reply

    true

  • Amit Agarwal commented on May 15, 2014 Reply

    sunder aur bhaavpoorn!

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