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भोर एक सुकून

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भोर चुपके से आती
कानों में फुसफुसाती
मेरी नींद खुलती
मैं  फिर सो जाती
अलार्म की घंटी फिर
कानों को थपथपाती
अंगड़ाई भी आकर
मेरे तन को सहलाती

विवश हो मैं उठ जाती
खोल दरवाजा बाहर आती
ताज़ी हवा बन झोंका
मेरे गले लग जाती
कोयल की कुहू कुहू
चिड़ियों की चहचहाहट
मन को गुदगुदा जाती
चुपके से झांकते
स्वर्णिम सूरज से
मैं अँखिया लड़ाती

सुबह की सैर का
भरपूर आनंद उठाती
लौट चाय की ललक
रसोई में ले जाती
कड़क चाय और
अख़बार संग
दोस्ती निभाती
सुकून के इन पलों को
मुट्ठी में संजोना चाहती
पर भागते वक़्त संग
भागती चली जाती

उलझ सी जाती बस
जीवन की भूल भुलैया में
भागती  दौड़ती सी
एक अनोखी दुनिया में
यूँ ही शाम और
फिर रात हो जाती
होठों पे मुस्कान लिए
मैं  सो जाती
उसी भोर के इंतज़ार में
उसी सुकून की तलाश में

डॉ अर्चना गुप्ता

 

5 Comments

  • Kokila commented on September 29, 2014 Reply

    Bhor ka sukoon is really awesome. Bhagti daudti zindagi ki tayyari mein subah ka arpan , jaise aashirvad ho bhagvaan ka.

  • Ashish kumar commented on July 31, 2014 Reply

    bahut sundar kavita. saral aur sehaj shabdo me anoothi bhent kaafi pasand ayi…

  • yogi saraswat commented on July 31, 2014 Reply

    सुबह की सैर का
    भरपूर आनंद उठाती
    लौट चाय की ललक
    रसोई में ले जाती
    कड़क चाय और
    अख़बार संग
    दोस्ती निभाती
    सुकून के इन पलों को
    मुट्ठी में संजोना चाहती
    पर भागते वक़्त संग
    भागती चली जाती
    एकदम बढ़िया

  • hema commented on July 25, 2014 Reply

    bilkul sahi

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