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मुक्तक (10 )

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इस जीवन में चारों ओर

मैं ही मैं का देखा शोर

इस मैं को तुम देना छोड़

नाजुक है जीवन की डोर

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नहीं पाते समझ वो भावना मेरी

बताऊँ अब किसे क्या कामना मेरी

करूँ तो प्यार का इजहार कैसे मैं

अधूरी रह न जाये साधना मेरी

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कभी हमारा अपनापन देखा करो

कभी हमारे अपने बन देखा करो

हमें  नहीं चाहा तुमने यूँ तो मगर

कभी हमारा टूटा मन देखा करो

डॉ अर्चना गुप्ता

 

 

3 Comments

  • Amit Agarwal commented on September 29, 2014 Reply

    Very nice!

  • yogi saraswat commented on September 27, 2014 Reply

    नहीं पाते समझ वो भावना मेरी

    बताऊँ अब किसे क्या कामना मेरी

    करूँ तो प्यार का इजहार कैसे मैं

    अधूरी रह न जाये साधना मेरी
    ​बहुत बढ़िया

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