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मुक्तक (24)

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काँटा हूँ चुभता रहता हूँ

फूलों से कब कुछ कहता हूँ

आकर रस पी जाता भँवरा

बेबस हो मैं सब सहता हूँ

(71)

हाथ सर पर आपका जब से मिला हमको

ना रहा भगवान से कोई गिला हमको

मित्र भी हैं मार्गदर्शक भी हमारे हैं

कर्म का कोई मिला अच्छा सिला हमको

 

(72)
सब करें मिल सफाई चले आइये

दूर करने बुराई चले आइये

देश को स्वच्छ अपने सभी मिल करें

छोड़ अपनी लड़ाई चले आइये


डॉ अर्चना गुप्ता

2 Comments

  • hem lata commented on March 11, 2015 Reply

    wah

  • yogi saraswat commented on February 13, 2015 Reply

    हाथ सर पर आपका जब से मिला हमको

    ना रहा भगवान से कोई गिला हमको

    मित्र भी हैं मार्गदर्शक भी हमारे हैं

    कर्म का कोई मिला अच्छा सिला हमको
    बहुत सुन्दर अर्चना जी

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