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मुक्तक (29)

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(85 )

दोस्त जब बादलों को बनाया हमने

जो कलम ने लिखा वो सुनाया हमने

एक सैलाब सा आ गया धरती पर

‘अर्चना’ हाल जब भी बताया हमने

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तन्हा हमारा दिल बिचारा हो गया

तुम से बिछुड़ना फिर गँवारा हो गया

परछाइया भी अब डराती हैं हमें

इन आँसुओं का ही सहारा हो गया

(87 )

लोग कहते चाँद में ये दाग है

चाँद ही दिल में लगाये आग है

चाँद सा मुखड़ा कहा , फिर दोष भी

इस जहाँ का भी अजब ये राग है
डॉ अर्चना गुप्ता

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