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मुक्तक (38 )

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झुर्रियां  अब बे हिसाब बन गई

मोहब्बतों की किताब बन गईं

याद माँ की आ रही है  देखकर

पाखुरी खिल खिल गुलाब  बन गईं

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गुनगुनी धूप का हो रहा भास है

दूर होगी गलन अब यही आस है

लोग भी आ गये हैं छतों -पार्क में

हर किसी में नया आज उल्लास है

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याद के दीपक जलाये

प्रीत में सपने सजाये

ज़िन्दगी ने जब दिये गम

अश्क के मोती लुटाये

डॉ अर्चना गुप्ता

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