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मुक्तक (40 )

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(118 )

जुल्मी घटा घिरी है कितना हमें डराये

अब आँख से हमारी सावन बरस न जाये

नित रोज ही बहाने करते नये नये तुम

हम प्यार ये तुम्हारा बिल्कुल समझ न पाये

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बस याद हमको आपकी नादानियाँ रहीं

लब चुप रहे पर बोलती खामोशियाँ रहीं

हमने हजारों दीप यादों के जला लिये

चाहे ज़माने की लगी पाबंदियाँ रहीं

डॉ अर्चना गुप्ता

(120 )

जब भी कभी डिगे पग ,पथ आपने दिखाया

हर हौंसला बढ़ाकर ,आगे हमें बढ़ाया

जब टूटकर बिखर कर ,बरबाद हो रहे थे

तब ज़िन्दगी से हमको ,था आपने मिलाया

डॉ अर्चना गुप्ता

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