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मुक्तक (41 )

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ऐसा क्यों कर कहते हो

तुम पलकों पर रहते हो

जीवन के हर सुख दुख को

साथ तुम्हीं तो सहते हो

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मै अकेले सफ़र कर रहा हूँ

ज़िन्दगी यूँ बसर कर रहा हूँ

रोशनी तो मिली ही नहीं है

तीरगी में गुज़र कर रहा हूँ

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मन सागर की बहती लहरें

सुख दुख दोनों सहती लहरें

गीतों में ढल ढल कर सारे

जग की बातें कहती लहरें

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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