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मुक्तक (43 )

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(127 )

धरती माँ का हमको कर्ज चुकाना है

अपनी माँ का हमको दर्द मिटाना है

इक इक पौधा जीवन देने वाला हो

हम सबको मिलजुल कर फ़र्ज़ निभानाहै

(128 )

धूप खिली है आज धरा मुस्काई है

ठिठुरन से भी राहत सबने पाई है

रंग बिरंगे फूल खिले हैं उपवन में

फागुन की मस्ती सी देखो छाई है

(129 )

सात रश्मियों से सजे , रथ पर हुये सवार

सूर्य देव मिलने चले, देखो शनि के द्वार

उत्तरायण गति से प्रभु ,चलते चलते आज

सुनो मकर में आ गये, जीवन के आधार

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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