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मुक्तक (44 )

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सब कहते बेटी का करते कन्यादान

बेटी तो होती है मात पिता की जान

दान जिसे करते अपना हीरा अनमोल

सर आँखों पर बैठा कहते उसको मान

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कितना मिलता खग का देखो मानव से व्यवहार है

नीड बनाकर रहते इनका भी बनता परिवार है

फर्क यही है हम जो करते बदले में भी चाहते

प्रतिदान नही चाहत इनकी भोला इनका प्यार है

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अपने अपने जीवन के देखो हम सब हैं नायक

समय समय पर बन जाते फिर क्यों हम हैं खलनायक

दुनिया हर पल याद करे कुछ ऐसा हम कर जायें

जन -जन को खुश हाल करें बन जायें हम जननायक
डॉ अर्चना गुप्ता

 

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