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मुक्तक (49 )

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जीवन की रीत निराली है

बचपन जैसे हरियाली है

मीत जवानी में कुछ कर ले

रात बुढ़ापे की काली है

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जीवन में शूलों का बोना आया है

अपनों पर जुल्मों का ढोना आया है

आसान नहीं इंसा का इंसा बनना

चैन जमाने का बस खोना आया है

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रंग धरती का निखर आया इधर

रूप फूलों का सँवर आया इधर

रश्मियों का जाल फैलाता हुआ

भोर का सूरज नजर आया इधर

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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