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मुक्तक (63 )

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(187 )

पीर की है नदी अश्क की धार है

डूबते पर नहीं प्रीत पतवार है

रीत बेदर्द है इस जहाँ की बड़ी

है जुदाई वहाँ पर जहाँ प्यार है

(188 )
छुपाना कठिन है बहुत प्यार मेरा

अधूरा रहेगा तुम्हारा बसेरा

अकेले नहीं जी सकोगे जहां में

मुझी से मिलेगा ख़ुशी का सवेरा

(189 )

जाने कब वो इनाम आएगा

दिल को उनका सलाम आएगा

रास्ता ढ़ूँढता है मंजिल को

देखिये कब मुकाम आएगा
डॉ अर्चना गुप्ता

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