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मुक्तक (66 )

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(196 )

तुम मान करना पर कभी अभिमान मत करना

माता पिता का तुम कभी अपमान मत करना

उनसे मिली ये ज़िन्दगी उनकी अमानत है

उनसे अलग अपनी कभी पहचान मत करना

(197 )

गये जब भूल तुम हमको  चहकते हम भला कैसे

गिरे पतझड़ के’पत्तों से  लहकते हम भला कैसे

तुम्हीं से थी बहारें खुशबुओं से मन बहकता था

हुये अब फूल कागज़ के महकते हम भला कैसे

(198 )

आग विरहा की दिल को जलाने लगी

ये पवन यूँ मुझे अब सताने लगी

प्रीत गागर भी रीती पड़ी है सजन

याद हर पल मुझे फिर रुलाने लगी

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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