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मुक्तक (67 )

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घर को केवल घर कब जाना

घर को मैंने मंदिर माना

बच्चों की खुशिओं में जन्नत

माँ बनकर मैंने पहचाना

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बनाते सैकड़ों झूठे बहाने

गए थे गोपियों को तुम सताने

नहीं अब बोलती कान्हा सुनो मैं

करो जितने जतन पर मन न माने

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क्यों पुराने सवाल करते हो

बेबजह ही बवाल करते हो

जीत किस की हुई बताओ मत

तोड़कर दिल कमाल करते हो

डॉ अर्चना गुप्ता

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