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मुक्तक (68 )

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वो चित्र बहुत अब भाता है

जो माँ की याद दिलाता है

प्यारे प्यारे बचपन के दिन

दिखला आँखें भर लाता है

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मीत होकर भी नहीं स्वीकार करते

क्यों हमारे प्यार से इन्कार करते

आज तक भी ये समझ पाये नहीं हम

बस दिखावे के लिये मनुहार करते

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वक्त कर्मों का सिला देता है

आस के गुल को खिला देता है

ये कभी रुकता नहीं चलता बस

वक्त बिछड़ों को मिला देता है

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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