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मुक्तक (72 )

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हमें जब मिले ख्वाब में ही मिले

अधूरे रहे प्यार के सिलसिले

खुली आँख ने अश्क भर कर कहा

झरे फूल चाहत के जितने खिले

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दर्द हम सहते रहे हैं

दूर ही रहते रहे हैं

हम ह्रदय की बात को अब

मन ही’ मन कहते रहे हैं

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आज अपने सभी अजनबी हो गये

जो सहारे बने थे कहीं खो गये

श्वेत दामन पे जितने लगे दाग हैं

आँख के अश्रु आकर उन्हें धो गये

डॉ अर्चना गुप्ता

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