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मुक्तक (8 )

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खबर कब थी ज़माने को मुझे गम ने भिगोया था

रहा था जागता मै रात भर बिल्कुल न सोया था

जुदा जब तुम हुये मुझ से छुड़ाकर प्यार का दामन

डुबोया था समन्दर भी सनम इतना मैं रोया था

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हमें भी वक्त ने कितना सताया है

दिए है दर्द आँसू से रुलाया है

कभी तो भाग्य बदलेगा हमारा भी

इसी उम्मीद पर हर पल बिताया है

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मुहब्बत हमारी सजा हो गई है

जहाँ की ख़ुशी बेमज़ा हो गई है

गिला क्या करें हम तुम्हारी जफा का

जुदाई हमारी रजा हो गई है

डॉ अर्चना गुप्ता

3 Comments

  • shweta commented on September 19, 2014 Reply

    bahut hi sundar rachna, dil ko chhu gayi.

  • Amit Agarwal commented on September 19, 2014 Reply

    Waah! kyaa baat hai!!

  • Ravish Mani commented on September 19, 2014 Reply

    Bahut sudar! 🙂

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