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सपने का सफ़र

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बंद आँखों की डिबिया से
एक सपने ने देखा झांक कर
फिर रोका अपने कदमों को
घना  अंधकार  देखकर
बाहर निकलने को
वो सपना आतुर था
असर ना उस पर मन के
समझाने  का था

वो तो बस मचल पड़ा
दहलीज़ आँखों की
पार कर डरते डरते
बाहर निकल पड़ा
जुबां नहीं थी  उसकी
पर अरमान तो थे
खुला आसमान ऊपर
हौंसले बुलंदी पर  थे

राह में मुश्किलें भी कुछ
कम नही आई उस पर
कभी अपनों ने कभी गैरों ने
खूब सितम किये उस पर
राह में उसके कई जगह
पैरों में हुई कुछ जलन
वो थी कुछ सपनों के
आत्मदाह की ही अगन

पर हुआ ना वो विचलित
रहा अपने पथ पर अढिग
कुछ नए सृजन की आद्रता से
कुछ कृत संकल्प की ऊष्मा से
सपने के बीज बीजित हुए
सपना पूरा करने को
बादल भी जैसे बरस गए।

-डॉ अर्चना गुप्ता

14 Comments

  • Sarvesh Kumar Singh commented on November 24, 2014 Reply

    bahut sundar krati hai archana ji

  • hema commented on July 11, 2014 Reply

    very nice

  • Jai Bhagwan Sharma commented on July 10, 2014 Reply

    Very nice mem

  • Dr.Mamta Singh commented on April 19, 2014 Reply

    Mausi ur poems are amazing

    • Dr. Archana Gupta commented on April 19, 2014 Reply

      thanx beta … tumne pad bhi liya sabko itni jaldi.Intelligent girl.

  • Rajendra singh shekhawat commented on April 19, 2014 Reply

    प्रशंसनीय प्रस्तुति

    • Dr. Archana Gupta commented on April 19, 2014 Reply

      शुक्रिया राजेंद्र जी।

  • Dr.Mamta Singh commented on March 30, 2014 Reply

    Sapne ka safar bahut achchha hai

    • Dr. Archana Gupta commented on March 31, 2014 Reply

      धन्यवाद ममता इसे पसंद करने के लिए।

  • Deepa agarwal commented on March 30, 2014 Reply

    अहसासो से भरा हुआ सपने का सफर ।

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