मुक्तक (76 )

(226 ) रोते मुस्काते जीवन की मैं एक कहानी लिखती हूँ तेरे मन की अपने मन की जानी पहचानी लिखतीहूँ सरहद पर मरने वाले जो हँसते हँसते बलिदान हुये उन माताओं के लालों की मैं वीर जवानी लिखती हूँ (227Read more…

मुक्तक (75 )

(223 ) धरा काँपी मिटा घरवार है देखो बहा आँसू रहा संसार है देखो न जाने लोग कितने हैं मरे इसमें पड़ी कुदरत की कैसी मार है देखो (224 ) आँख में आँसू नजर आने लगा है अब हर समयRead more…

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मुक्तक (74 )

(220 ) बड़ा अभिमान था खुद पर झुका कर सर नहीं देखा कमाई खूब दौलत धर्म अपना पर नहीं देखा समय की मार तो देखो न काया है न माया है सभी ने साथ अब छोड़ा तुझे मुड़ कर नहींRead more…

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मुक्तक (73 )

(217 ) लेकर समन्दर प्यास के बैठे रहे हम पास समझे नही फिर भी हमारे वो कभी अहसास सहते रहे हम जिन्दगी भर आँसुओं की पीर फिर से बने दुख मीत अपने सुख चले वनवास (218 ) जुल्म को सहनाRead more…

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मुक्तक (72 )

(214 ) हमें जब मिले ख्वाब में ही मिले अधूरे रहे प्यार के सिलसिले खुली आँख ने अश्क भर कर कहा झरे फूल चाहत के जितने खिले (215 ) दर्द हम सहते रहे हैं दूर ही रहते रहे हैं हमRead more…

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मुक्तक (71 )

(211 ) बेहाल ज़िन्दगी को आराम कब मिलेगा बंज़र हुई धरा पर इक फूल कब खिलेगा खाई बहुत हैं’ हमने ठोकर कदम कदम पर अब घाव वक़्त जाने कब देखिये सिलेगा   (२१२) खुद को खुली किताब बनाया नहीं गयाRead more…

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मुक्तक (70 )

(208 ) अलग जबसे हुए हो तुम लगे वनवास सा जीवन नयन में आ गए आँसू लगे परिहास सा जीवन न समझे हो न समझोगे हमारे प्यार की कीमत हकीकत में तुम्हारे बिन हुआ इतिहास सा जीवन (209 ) धराRead more…

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मुक्तक (69 )

(205 ) चलो दिल को जलाकर दिल आज फिर से रौशनी कर दें मिटा कर नफ़रतें, दिल में मुहब्बत की ख़ुशी भर दें दुखी लाचार हैं जिनका नही संसार में कोई हटाकर शूल हम उनके, चुभन की पीर को हर देंRead more…

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मुक्तक (68 )

(202 ) वो चित्र बहुत अब भाता है जो माँ की याद दिलाता है प्यारे प्यारे बचपन के दिन दिखला आँखें भर लाता है (203 ) मीत होकर भी नहीं स्वीकार करते क्यों हमारे प्यार से इन्कार करते आज तकRead more…