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मुक्तक (५)

१३। चीर कर सीना नदी का रोज चलती नाव है वार सह पतवार के फिर आप सहती घाव है जानती है फर्ज अपना,काम अपना जानती पार करती है सभी को ,तारना ही भाव है   १४। जताना कर्म ही काफीRead more…

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मुक्तक (४ )

१०। समझ कर नासमझ तुझ को किया गुमराह ही खुद को असल था रूप वो तेरा समझ कब आ सका मुझ को डॉ अर्चना गुप्ता ११। जाकर के परदेश हमें यूँ भूल न जाना जीवन के रिश्तों को प्रियवर आपRead more…

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मुक्तक (३)

७। पेड़ों पर झूले डोल गये बातों का बस्ता खोल गये पीहर  की बीती यादों को आँखों के आँसूं बोल  गये   ८। मौसम ने भी श्रृंगार किया जीवन भी खुशगंवार किया रिमझिम २ मेघा बरसे हर प्रेमी मन गुंजारRead more…

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मुक्तक (२)

४. शब्द से सौ – वार डरते घाव भी हैं शब्द बन हथियार करते घाव भी हैं टूट जाओ गर किसी की बात से तुम शब्द बनकर प्यार भरते घाव भी हैं ५। कोई दंश सर्प का झेल रहा कोईRead more…

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मुक्तक (१ )

१। प्यार जब से मिला खिल कमल हो गए नैन तुम से मिले फिर सजल हो गए थे अधूरे बहुत हम तुम्हारे बिना तुमसे मिलकर सनम हम गजल हो गये २। रिश्ता हमारा था पुराना याद कर जब प्यार काRead more…

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कुण्डलिनी छंद (१ ).

  १ अपनों से तू प्रीत कर ,अपनों को मत खोय दुख में तेरे सँग चले ,अपना ही प्रिय कोय अपना ही प्रिय कोय ,अरे ओ भोले भाले रिश्ते हैं अनमोल ,प्रेम से इन्हें निभाले २  बिन बोले सब बोलRead more…

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बाज़ारवाद वोट का

वोट पर भी बाज़ारवाद की परत मत चढाओ। स्याही दिखाकर छूट देकर अपनी सेल मत बढाओ। हमारा हक़ हमारी ताकत है हमारा वोट। इसे भी भुना सकते हो येगलत  सन्देश मत फैलाओ। डॉ अर्चना गुप्ता  

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चुनाव एक मनोरंजन

रोज हो रहे है सियासी हमले गरम सियासत के बहाने लगे हैं नेता एक दूसरे को पटकने, चुनाव का कोई फायदा हो या न हो पर मनोरंजन तो कर दिया हम सबका रोज इसने।   – डॉ अर्चना गुप्ता