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मुक्तक (61 )

 

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अभिनन्दन करते हैं आज तुम्हारा

है साथ तुम्हारे आशीष हमारा
अपनी जान बसी है जिसमें हर पल

सौंप दिया तुमको वो अपना प्यारा
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किताबों में जहां कब ढ़ूँढता है वो

जहाँ गूगल वहीँ पर डूबता है वो

धरोहर ज्ञान की इन में छिपी रहती

किताबों से भला क्यों ऊबता है वो

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ज़िन्दगी ये कभी भी ठहरती कहाँ

है कभी ये यहाँ तो कभी है वहाँ

मंजिलें भी सुनो रोज मिलती नहीं

चाहतों का लुटा कारवाँ है यहाँ

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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