मुक्तक (46 )

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काली काली जुल्फों से ,इक लट ऐसी छितराई

चाँद सरीखे मुखड़े पर, आवारा सी लहराई

काले नैन कटीले उस के गालों में है डिम्पल

गौरी ने दर्पण देखा ,तो खुद पर ही शरमाई

(137 )

चले आज पावन सुगन्धित समीर

छुआ मन किसी ने हुये हम अधीर

बढ़ी धड़कनेऔर छाया खुमार

गुलाबी हुए गाल जैसे अबीर

(138 )

साथ तुम्हारा हमको न्यारा लगता है

साथ तुम्हारे हर गम हारा लगता है

नाम नहीं है कोई भी इस रिश्ते का

पर सब रिश्तों से ये प्यारा लगता है

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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Dr. Archana Gupta

Dr. Archana Gupta loves to give words to her thoughts in the form of poems, stories and articles. She is passionate about learning new things and admire the beauty of the world.

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