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मुक्तक (४२ )

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घाव मन के पुराने हरे हो गये

आज वो सामने जब खड़े हो गये

मुश्किलों से भुलाया उन्हें था मगर

ये नयन देख फिर बावरे हो गये

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इम्तहानों के जमाने हो गये

बिन हँसे ही ये फसाने हो गये

आह भरना यूँ हमें आता नहीं

दर्द भी हम पर दिवाने हो गये

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देखकर घाव नैना सजल हो गए

चैन खो सा गया हम विकल हो गए

प्यास कैसे बुझेगी बताओ हमें

स्त्रोत जल के सभी जब गरल हो गए

डॉ अर्चना गुप्ता

 

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